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गुरु कहै सो कीजिए, करै सो कीजै नाहिं।

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आदमी जहां है वहां तृप्ति नहीं है। आदमी जहां है वहां दुख और विषाद है। और आदमी को जहां तृप्ति की आशा दिखाई पड़ती है वह दूसरा किनारा बहुत दूर धुंध में छाया मिल भी सकेगा निर्णय करना मुश्किल है। है भी यह भी निश्चय करना मुश्किल है। इस किनारे पर कोई सुख नहीं है। उस किनारे पर आशा है लेकिन कैसे उस किनारे तक कोई पहुंचे माझी खोजना होगा। किसी ऐसे का साथ चाहिए जो उस पार हो जो उस पार हो आया हो जिसने संतुष्टि का स्वाद जाना हो जो मोक्ष की हवा में जीया हो। किसी मुक्त का सत्संग चाहिए। गुरु का इतना ही अर्थ है। गुरु का अर्थ हैः इस किनारे होकर भी जो इस किनारे का नहीं। इस किनारे होकर भी जो उस किनारे का सबूत है। इस किनारे होकर भी जो वस्तुत उस किनारे ही रहता है। तुम्हारे बीच है तुम्हारे जैसा है फिर भी तुम्हारे बीच नहीं। फिर भी तुम्हारे जैसा नहीं। गुरु का अर्थ है जहां कुछ अपूर्व घटा है। जहां बीज अब बीज ही नहीं फूल बन गए है। जहां संभावना वास्तविक हुई है जहां मनुष्य की अंतिम मंजिल पूरी हुई है जहां मनुष्य अपनी निष्पत्ति को उपलब्ध हुआ है। गुरु का अर्थ है तुम्हारा भविष्य। गुरु का अर्थ है ...

योग का पहला सूत्र है कि जीवन ऊर्जा है, लाइफ इज एनर्जी।

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योग का पहला सूत्रः योग का पहला सूत्र है कि जीवन ऊर्जा है, लाइफ इज एनर्जी। जीवन शक्ति है। बहुत समय तक विज्ञान इस संबंध में राजी नहीं था; अब राजी है। बहुत समय तक विज्ञान सोचता थाः जगत पदार्थ है, मैटर है। लेकिन योग ने विज्ञान की खोजों से हजारों वर्ष पूर्व से यह घोषणा कर रखी थी कि पदार्थ एक असत्य है, एक झूठ है, एक इल्यूजन है, एक भ्रम है। भ्रम का मतलब यह नहीं कि नहीं है। भ्रम का मतलबः जैसा दिखाई पड़ता है वैसा नहीं है और जैसा है वैसा दिखाई नहीं पड़ता है। लेकिन विगत तीस वर्षों में विज्ञान को एक-एक कदम योग के अनुरूप जुट जाना पड़ा है। अठारहवीं सदी में वैज्ञानिकों की घोषणा थी कि परमात्मा मर गया है, आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है, पदार्थ ही सब कुछ है। लेकिन विगत तीस वर्षों में ठीक उलटी स्थिति हो गई है। विज्ञान को कहना पड़ा कि पदार्थ है ही नहीं, सिर्फ दिखाई पड़ता है। ऊर्जा ही सत्य है, शक्ति ही सत्य है। लेकिन शक्ति की तीव्र गति के कारण पदार्थ का भास होता है। दीवालें दिखाई पड़ रही हैं एक, अगर निकलना चाहेंगे तो सिर टूट जाएगा। कैसे कहें कि दीवालें भ्रम हैं? स्पष्ट दिखाई पड़ रही हैं, ...

कर्म से कर्म नहीं कटता, अकर्म से कर्म कटता है

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यह जो अनंत अनंत कर्म इकट्ठे कर लिए जाते हैं, इस समाधि के द्वारा नष्ट हो जाते हैं। यह थोड़ा समझने जैसा है। क्योंकि अनेक लोग सोचते हैं कि अगर कर्म बुरे इकट्ठे हो गए हैं तो अच्छे कर्म करके उनको नष्ट कर दें, वे गलती में हैं। बुरे कर्मों को अच्छे कर्म करके नष्ट नहीं किया जा सकता। बुरे कर्म बने रहेंगे और अच्छे कर्म और इकट्ठे हो जाएंगे, बस इतना ही होगा। वे काटते नहीं हैं एक दूसरे को। काटने का कोई उपाय नहीं है। एक आदमी ने चोरी की, फिर वह पछताया और साधु हो गया। तो साधु होने से वह चोरी का कर्म और उसके जो संस्कार उसके भीतर पड़े थे, वे कटते नहीं हैं। कटने का कोई उपाय नहीं है। साधु होने का अलग कर्म बनता है, अलग रेखा बनती है। चोर की रेखा पर से साधु की रेखा गुजरती ही नहीं है। चोर से साधु का क्या लेना देना! आप चोर थे, आपने एक तरह की रेखाएं खींची थीं, आप साधु हुए, ये रेखाएं उसी स्थान पर नहीं खिंचती हैं जहां चोर की रेखाएं खिंची थीं। क्योंकि साधु होना मन के दूसरे कोने से होता है, चोर होना मन के दूसरे कोने से होता है। तो होता क्या है, आपके चोर होने की रेखा पर साधु होने की रेखाएं और आच्छादित ह...

तनाव से भरा व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता

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तनाव से भरा व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता। क्यों? तनाव से भरा व्यक्ति हमेशा किसी उद्देश्य के लिए जीता है। वह धन कमा सकता है लेकिन प्रेम नहीं कर सकता। क्योंकि प्रेम का कोई उद्देश्य नहीं प्रेम कोई वस्तु नहीं। तुम उसका संग्रह नहीं कर सकते; तुम उसे बैंक में जमा-पूंजी नहीं बना सकते, तुम उससे अपने अहंकार को मजबूत नहीं कर सकते। निश्चित ही प्रेम एक बहुत ही अर्थहीन कृत्य है जिसका उसके पार कोई अर्थ नहीं कोई उद्देश्य नहीं। उसका अस्तित्व किसी और चीज के लिए नहीं अपने ही लिए है। प्रेम-प्रेम के लिए है। तुम कुछ पाने के लिए धन कमाते हो वह एक साधन है। तुम घर बनाते हो किसी उद्देश्य से उसमें रहने के लिए बनाते हो, यह एक साधन है। प्रेम साधन नहीं है। तुम प्रेम क्यों करते हो? किसलिए करते हो? प्रेम अपने में एक साध्य है। इसीलिए बुद्धि जो बहुत हिसाबी-किताबी है तर्कवान है जो हमेशा उपयोगिता की भाषा में सोचती है प्रेम नहीं कर सकती। और जो बुद्धि हमेशा किसी उपयोगिता किसी उद्देश्य की भाषा में ही सोचती है वह सदा तनावपूर्ण रहती है। क्योंकि उद्देश्य की पूर्ति भविष्य में होगी अभी और यहां कभी नहीं होती। तुम ...

अंतर्यात्रा प्रारंभ कैसे की जाए ?

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यात्रा का प्रारंभ तो पहले ही से हो चुका है, तुम्हें वह शुरू नहीं करना है। प्रत्येक व्यक्ति पहले से यात्रा में ही है। हमने अपने आपको यात्रा पथ के मध्य में ही पाया है। इसकी न तो कोई शुरुआत है और न कोई अंत। यह जीवन ही एक यात्रा है। जो पहली बात समझ लेने जैसी है वह यह है कि इसे प्रारंभ नहीं करना है, यह हमेशा से ही चली जा रही है। तुम यात्रा ही कर रहे हो। इसे केवल पहचानना है। अचेतन रूप से तुम यात्रा में ही हो, इसलिए यह महसूस होता है कि जैसे मानो तुम्हें उसका प्रारंभ करना है। इसे पहचानो, इसके बारे में सचेत हो जाओ केवल पहचान ही शुरुआत बन जाती है। जिस क्षण यह पहचान लेते हो, कि तुम हमेशा से ही गतिशील हो, और कहीं जा रहे हो, जाने— अनजाने इच्छापूर्वक या अनिच्छापूर्वक लेकिन तुम चले जा रहे हो. कोई महान शक्ति तुम्हारे अंदर निरंतर कार्य कर रही है परमात्मा ही तुममें खिल रहा है। वह निरंतर तुम्हारे अंदर कुछ न कुछ सृजन कर रहा है, इसलिए ऐसी बात नहीं, कि इसे कैसे शुरू करें। ठीक प्रश्न तो यह होगा। इसे कैसे पहचानें 7 वह तो यहां है, लेकिन वहां उसकी पहचान न हो सकी है। उदाहरण के लिए वृक्ष मर जाते ह...

हर चक्र की अपनी नींद

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सहस्‍त्रार को छोड़ कर प्रत्‍येक चक्र की अपनी नींद है। सातवें चक्र में बोध समग्र होता है। यह विशुद्ध जागरण की अवस्‍था है। इसीलिए कृष्‍ण गीता में कहते है कि योगी सोता नहीं। ‘योगी’ का अर्थ है जो अपने अंतिम केंद्र पर पहुंच गया। अपनी परम खिलावट पर जो कमल की भांति खिल गया। वह कभी नहीं सोता। उसका शरीर सोता है। मन सोता है।वह कभी नहीं सोता। बुद्ध जब सो भी रहे होते है तो अंतस में कहीं गहरे में प्रकाश आलोकित रहता है। सातवें चक्र में निद्रा का कोई स्‍थान नहीं होता। बाकी छ: चक्रों में यिन और यैंग, शिव और शक्‍ति, दोनों है। कभी वे जाग्रत होते है और कभी सुषुप्‍ति में—उनके दोनों पहलू है। जब तुम्‍हें भूख लगती है तो भूख का चक्र जाग्रत हो जाता है। यदि आपने कभी उपवास किया तो आप चकित हुए होंगे। शुरू में पहले दो या तीन दिन भूख लगती है। और फिर अचानक भूख खो जाती है। यह फिर लगेगी और फिर समाप्‍त हो जाएगी। फिर लगेगी……ओर तुम कुछ भी नहीं खा रहे हो। इसलिए तुम यह भी नहीं कह सकते हो कि ‘भूख मिट गई। क्‍योंकि मैंने कुछ खा लिया है। तुम उपवास किए हो, कभी-कभी तो भूख जोरों से लगती है। तुम तड़पा जाते हो। ...

हमारी नीति और विकृतियां

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फिल्म पर जो स्त्री हम देख रहे हैं वह स्त्री असली नहीं है। वह स्त्री नब्बे प्रतिशत आदमी की ईजाद है। उसकी सारी बनावट, उसका सारा सौंदर्य, उसके अंग का अनुपात, वह सब ईजाद है। वह सारी व्यवस्था है। वह सब फोटोग्राफी है, वैज्ञानिक टेक्नीक है। और एक ऐसी स्त्री हम देख रहे हैं जिसको पहले ऋषि-मुनि स्वर्ग में अप्सरा को देखा करते थे, अब हम उसको फिल्म में देख रहे हैं। ऋषि-मुनियों को अप्सरा देखनी पड़ती थी, क्योंकि फिल्म उपलब्ध नहीं थी। हमको फिल्म देखने को मिल गई इसलिए अप्सरा की हमने फिक्र छोड़ दी। लेकिन वह जो अप्सरा जैसी स्त्री खड़ी हो गई है वह नुकसान पहुंचाएगी। क्योंकि उसका एक बिंब हमारे मन में बनने वाला है, बनेगा ही। हमारी मांग भी वही है। और कोई असली स्त्री उस बिंब को पूरा नहीं कर पाएगी। तो कठिनाई हो ही जाने वाली है। कोई असली स्त्री न उतनी सुगंधित मालूम पड़ेगी, न उतनी सुंदर मालूम पड़ेगी, न उतनी अदभुत मालूम पड़ेगी। असली स्त्री असली होगी, ठोस होगी। शरीर होगा, शरीर में पसीना भी होगा, बदबू भी होगी। और सौंदर्य दो दिन में फीका भी पड़ जाएगा। ठीक ही है। वह सौंदर्य न फीका पड़ता, फासले पर है, दूर है। ...